मौजूदा दौर में जब अपने पथ से भटके हुए देखता हूँ देश के युवा को, तब मन विचलित हो उठता है..
आज के युवा को दिल्ली के अलग-अलग कोने में बने मॉलस का तो पता होता है लेकिन राष्ट्रीय-गान और राष्ट्रीय-गीत का अंतर नहीं मालूम.. दिल्ली का सबसे बड़ा या सबसे नया मॉल कौन सा है., यह तो पता रहता है लेकिन हमारी राष्ट्रीय धरोहरों के प्रति अपनी ज़िम्मेदारियों को लेकर यह पीढ़ी पूरी तरह से उदासीन है..!
इसी परिस्थिति का आकलन करते हुए जो मनोभाव ज़ेहन में उभरते हैं उनको शब्दों में उतारने का प्रयास किया है., उम्मीद है, प्रभाव न डाले भले ही मगर कुछ समय के लिए ठिठक कर सोचने पर ज़रूर आमादा करेगा-
आज हवाएं ज़हरीली हैं, पर साँस लेना मजबूरी है.,
उल्टी गँगा क्यूँ न बहे, कि अब बदलाव ज़रूरी है.!
हिंद मेरा आज खतरे में हैं., हिंदी युवा बेफिक्री में.,
जाग जा ऐ शेर-ए-हिंद, तेरी एक दहाड़ ज़रूरी है..!!
रिश्तों की मर्यादाएं भूल गये., मानवता तुमको रास नहीं.,
किस गर्त में तुम गिरते जा रहे., इस पर विचार ज़रूरी है.!
स्वार्थान्धता के दौर में, क्यूँ दुनिया यूँ पगला रही.,
इस तबाही से बचने को पागलपन का प्रतिकार ज़रूरी है.!!
ज़ुर्म देखकर चुप रहना, कायरता का प्रमाण है.,
सहनशीलता अब साथ छोड़ती, मुंहतोड़ जवाब ज़रूरी है.!
बहुत अनुसरण अनीति का कर लिया, शिष्टता से दूर खूब अब रह लिए.,
संस्कृति का अनुगमन., अब शील स्वभाव ज़रूरी है..!!
सह न सके जो वक़्त के थपेड़े, टूटने दो वो बांध सब्र के.,
सूखे मौसम बहुत हुए, अब तो सैलाब ज़रूरी है..!
तैरते-तैरते थक चुका हूँ, दुनिया के इस सागर में,
मुझको जो अब पार लगाये., वो संस्कार की नाव ज़रूरी है.!!
वो जिस सपनों के भारत की बात करे हैं., वो भारत सपनों में ही रह चुका.,
भारत.., भारत न बन सके., क्यूँ इतना अमरीकी प्रभाव ज़रूरी है..?
ग़मों के साये में पलता रहा उम्र भर, इक ख़ुशी बस मेरी जान ले गयी,
यह ख़ुशी किस के हिस्से की थी, इस बाबत हिसाब ज़रूरी है..!!
शब्दों पे पहरे लाख सही, पर लिखना मेरी मजबूरी है,
ये कागज़-कलम न छीनो, कि ये कलम-ओ-क़िताब ज़रूरी है.!
कागज़ दिया और कलम दी, पर सच लिखने का हक़ छीन लिया., तो जिंदा रह कर क्या करें.,
अब सच्चाई के कदमों में., कलम के सिपाही की शहादत ज़रूरी है..!!
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