Friday, 9 March 2012

मील का पत्थर या ठोकर राहों की...

मैं मील का पत्थर बनने चला था,
राहों में ठोकर बन कर रह गया..!
जीतने दुनिया चला था, सिकंदर बनने.,
हार कर फ़कत मुक़द्दर बन कर रह गया..!!

जिस सिम्त मुड़ जाते कदम मेरे.,
लगता था, राहें आसाँ होती जाएँगी.!
गुमाँ न था, ऐसा भी हो जायेगा.,
मेरे हासिल की बहारें भी बियाबाँ होती जाएँगी..!!
लेकर बहारों का मैं कारवाँ चला था, एक अकेला मुसाफिर बन कर रह गया..!
मैं मील का पत्थर बनने चला था, राहों में ठोकर बन कर रह गया..!!

जिस मुक़ाम को पाने का मैं संघर्ष किया करता था.,
उस सहर-ए-मुक़ाम का अब इंतज़ार किया करता हूँ मैं..!
जो शिकस्त मंज़ूर ही न थी कभी.,
उस शिकस्त को अब स्वीकार किया करता हूँ मैं..!!
विजय-रथ लेकर मैं जिस राह बढ़ चला था, उस राह में खोया हुआ एक पथिक बन कर रह गया..!
मैं मील का पत्थर बनने चला था, राहों में ठोकर बन कर रह गया..!!



Monday, 13 February 2012

आज की ज़रूरत

मौजूदा दौर में जब अपने पथ से भटके हुए देखता हूँ देश के युवा को, तब मन विचलित हो उठता है..
आज के युवा को दिल्ली के अलग-अलग कोने में बने मॉलस का तो पता होता है लेकिन राष्ट्रीय-गान और राष्ट्रीय-गीत का अंतर नहीं मालूम.. दिल्ली का सबसे बड़ा या सबसे नया मॉल कौन सा है., यह तो पता रहता है लेकिन हमारी राष्ट्रीय धरोहरों के प्रति अपनी ज़िम्मेदारियों को लेकर यह पीढ़ी पूरी तरह से उदासीन है..!
इसी परिस्थिति का आकलन करते हुए जो मनोभाव ज़ेहन में उभरते हैं उनको शब्दों में उतारने का प्रयास किया है., उम्मीद है, प्रभाव न डाले भले ही मगर कुछ समय के लिए ठिठक कर सोचने पर ज़रूर आमादा करेगा-


आज हवाएं ज़हरीली हैं, पर साँस लेना मजबूरी है.,
उल्टी गँगा क्यूँ न बहे, कि अब बदलाव ज़रूरी है.!
हिंद मेरा आज खतरे में हैं., हिंदी युवा बेफिक्री में.,
जाग जा ऐ शेर-ए-हिंद, तेरी एक दहाड़ ज़रूरी है..!!

रिश्तों की मर्यादाएं भूल गये., मानवता तुमको रास नहीं.,
किस गर्त में तुम गिरते जा रहे., इस पर विचार ज़रूरी है.!
स्वार्थान्धता के दौर में, क्यूँ दुनिया यूँ पगला रही.,
इस तबाही से बचने को पागलपन का प्रतिकार ज़रूरी है.!!

ज़ुर्म देखकर चुप रहना, कायरता का प्रमाण है.,
सहनशीलता अब साथ छोड़ती, मुंहतोड़ जवाब ज़रूरी है.!
बहुत अनुसरण अनीति का कर लिया, शिष्टता से दूर खूब अब रह लिए.,
संस्कृति का अनुगमन., अब शील स्वभाव ज़रूरी है..!!

सह न सके जो वक़्त के थपेड़े, टूटने दो वो बांध सब्र के.,
सूखे मौसम बहुत हुए, अब तो सैलाब ज़रूरी है..!
तैरते-तैरते थक चुका हूँ, दुनिया के इस सागर में,
मुझको जो अब पार लगाये., वो संस्कार की नाव ज़रूरी है.!!

वो जिस सपनों के भारत की बात करे हैं., वो भारत सपनों में ही रह चुका.,
भारत.., भारत न बन सके., क्यूँ इतना अमरीकी प्रभाव ज़रूरी है..?
ग़मों के साये में पलता रहा उम्र भर, इक ख़ुशी बस मेरी जान ले गयी, 
यह ख़ुशी किस के हिस्से की थी, इस बाबत हिसाब ज़रूरी है..!!

शब्दों पे पहरे लाख सही, पर लिखना मेरी मजबूरी है,
ये कागज़-कलम न छीनो, कि ये कलम-ओ-क़िताब ज़रूरी है.!
कागज़ दिया और कलम दी, पर सच लिखने का हक़ छीन लिया., तो जिंदा रह कर क्या करें.,
अब सच्चाई के कदमों में., कलम के सिपाही की शहादत ज़रूरी है..!!