Friday, 9 March 2012

मील का पत्थर या ठोकर राहों की...

मैं मील का पत्थर बनने चला था,
राहों में ठोकर बन कर रह गया..!
जीतने दुनिया चला था, सिकंदर बनने.,
हार कर फ़कत मुक़द्दर बन कर रह गया..!!

जिस सिम्त मुड़ जाते कदम मेरे.,
लगता था, राहें आसाँ होती जाएँगी.!
गुमाँ न था, ऐसा भी हो जायेगा.,
मेरे हासिल की बहारें भी बियाबाँ होती जाएँगी..!!
लेकर बहारों का मैं कारवाँ चला था, एक अकेला मुसाफिर बन कर रह गया..!
मैं मील का पत्थर बनने चला था, राहों में ठोकर बन कर रह गया..!!

जिस मुक़ाम को पाने का मैं संघर्ष किया करता था.,
उस सहर-ए-मुक़ाम का अब इंतज़ार किया करता हूँ मैं..!
जो शिकस्त मंज़ूर ही न थी कभी.,
उस शिकस्त को अब स्वीकार किया करता हूँ मैं..!!
विजय-रथ लेकर मैं जिस राह बढ़ चला था, उस राह में खोया हुआ एक पथिक बन कर रह गया..!
मैं मील का पत्थर बनने चला था, राहों में ठोकर बन कर रह गया..!!



No comments:

Post a Comment