Thursday, 8 September 2011

आत्म-विश्लेषण

सोचा नहीं था कि सोचना ही छोड़ दूंगा., और वो भी इस कदर कि खुद को इन्सान कहलाने में भी ज़िल्लत महसूस करूँगा... आज सुबह जब अख़बार उठाया तो देखा कि इन्सानियत किस कदर खाली तमाशा बन कर रह गयी है..
तब महसूस हुआ कि किस तरह से बेजान कागज़ी क़तरे कई लोगों की जिन्दगियों की कहानियाँ समेटे हुए थे खुद में...
लोगों में सम्वेदनाएँ मर चुकी हैं.. यह अहसास था कहीं न कहीं मगर आज अचानक से न जाने क्यों खुद को टटोलने लगा था मैं.. और अपने अन्दर झाँका तो पाया एक सम्वेदनहीन युवा जो दम्भ रखता है खुद को सम्वेदनशील बताने का... टटोला खुद को तो पाया- एक खोखला दम्भ.., हालात को खड़े-खड़े देखते रहने वाला एक इन्सान और उस से ज्यादा कुछ भी नहीं...
एक इन्सान कितना मजबूर होता है इसका अंदाज़ा है मुझे लेकिन मैं जहाँ कल सारा दिन काम करता रहा वहाँ से महज़ कुछ किलोमीटर की दूरी पर एक बम धमाके में कई जिस्मों के परखच्चे उड़ जाते हैं और मुझे पता तक नहीं चल पाता.. आखिर किस चीज़ के पीछे इस तरह भागा जा रहा हूँ मैं...? जब यह सवाल खुद से करता हूँ तो लगता है कि क्या सच में मैं वैसे ही जी रहा हूँ जैसे जीना चाहता हूँ., या कि जैसे जीना चाहिए...
फिर सवाल उठता है कि आखिर मैं कर भी क्या सकता हूँ..? लेकिन क्या यह अपने ज़िम्मेदार शहरी होने पर ही सवाल उठाने जैसा नहीं है...? सवाल तो आखिर यह होना चाहिए कि मैंने ऐसा कुछ किया क्यों नहीं., जिस से अपने अस्तित्व पर शर्मिंदा होने के बजाय गर्व अनुभव करता..?? आखिर क्यों मैं युवा भेड़ों की टोली में एक भेड़ बन चुका हूँ.. वो भेड़ें जो बिना किसी विचार के चलती जा रही हैं पैसे के पीछे..
छोटा सा था तो हर बात के लिए बहाना था कि बड़ा हो जाऊंगा तब करूँगा.. अब अपने बड़े होने पर ग्लानि होती है.. आखिर बड़े हो कर भी क्या कर लिया मैंने..??

बड़ी-बड़ी बातों से कुछ नहीं हो सकता.. छोटे-छोटे यत्न किये जाने चाहियें.. बड़ा बदलाव आएगा जरुर.. रोज़गार जीने की जरूरत है.. जीना रोज़गार की आवश्यकता नहीं.. समाज में., व्यवस्था में परिवर्तन अगर चाहिए तो बदलाव अपने भीतर से लाना होगा... हम धमाके रोक नहीं सकते तो क्या हुआ.., हम पीडितो की मदद तो कर ही सकते हैं.. मगर उस के लिए जानकारी होना आवश्यक है... खुद को., अपने समाज को और अपने संसार को समय देना जरूरी है..

क्या करें लेकिन., शहर में रहते हैं न.., शहरी हो गए हैं न.., इसीलिए जज़्बात और सम्वेदनाएँ मर चुकी हैं, हमारे अन्दर.. रोज़ लाशें देखने की आदत पड़ चुकी है.. अब तो शीशे में अपना अक्स भी मुर्दा सा जान पड़ता है..!  गाँव में होते तो आलम कुछ और होता... सोचना होगा कि शहरी वातावारण में आत्मीयता क्यों नहीं रह गयी है... क्यों हम बस अपने अलावा किसी और के बारे में सोच नहीं पाते....
इसी अंतर को महसूस कर दिल कहता है:-

इस शहर से गाँव मेरा कहीं अच्छा है..
सम्वेदनशील है मिट्टी जहाँ की, सम्वेदनहीन पक्के फर्श नहीं..!

यहाँ गाड़ियाँ हैं जो बातें हवा से करती हैं.,
मेरे गाँव में पैदल कदमों संग, मीठी सी बयार बहा करती है..!!

यहाँ मुर्दे चल रहे हैं, भाग रही हैं लाशें जाने किस स्पर्धा में.,
मेरे गाँव में मुर्दे दफना दिए जाते हैं और लाशें जला दी जाती हैं..!!

इस मुर्दों के शहर से मेरा गाँव कहीं अच्छा है...!!!!!

(और यकीन तो यह भी न था कि., इस ब्लॉग का पहला ही पोस्ट ऐसा होगा., लेकिन........ आखिर कहीं से तो धारा फूटनी ही थी.. और अब यह प्रवाह रुकेगा नहीं....)

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